क्योंकि मुख्य आरोपी फारुख चिश्ती का (Farukh Chishti) परिवार ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती के दरगाह पर ख़ादिम अथार्थ मुसलमानों में दरगाह का अधिकारी या रक्षक का काम करता था. और फारुख चिश्ती अजमेर युवा कांग्रेस का अध्यक्ष भी था.
इस केस के भयावहता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की - ओमेंद्र भारद्वाज जो उस वक्त अजमेर के डीआईजी थे, और बाद में राजस्थान के डीजीपी भी बने। उन्होंने कहा था कि आरोपित वित्तीय रूप से इतने प्रभावशाली थे और सामाजिक रूप से ऐसी पहुँच रखते थे कि पीड़िताओं को बयान देने के लिए प्रेरित करना पुलिस के लिए एक चुनौती बन गया था।
कोई भी पीड़िता आगे नहीं आना चाहती थी। उनका भी परिवार था, समाज था, जीवन था और ये लड़ाई उन्हें हाथी और चींटी जैसी लगती थी। केस लड़ने, आरोपितों के ख़िलाफ़ बयान देने और पुलिस-कचहरी के लफड़ों में पड़ने से अच्छा उन्होंने यही समझा कि चुप रहा जाए।
अजमेर दरगाह अनुमान कमिटी के जॉइंट सेक्रेटरी मोसब्बिर हुसैन ने एक बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए कहा था कि ये हमारे शहर पर लगा एक बदनुमा धब्बा है।
इस घटना के सामने आने के बाद पत्रकार संतोष गुप्ता के दफ्तर में लोगों का आना-जाना अचानक से ही बढ़ गया था। पूरे 90 के दशक में लोग लड़की की तस्वीर लेकर आते और पूछते थे- “क्या ये वही लड़की है?” दरअसल, वो ऐसे लोग होते थे, जिनकी शादी होने वाली होती थी और वो पहले ही इस बात की पुष्टि करना चाहते थे कि कहीं उनकी होने वाली पत्नी, या बहु बलात्कार की शिकार तो नहीं। इस कहानी में अजमेर है, चिश्ती हैं, रेप है और ब्लैकमेलिंग है।
यह क्रम संतोष गुप्ता द्वारा अजमेर रेप-कांड का भाँडाफोड़ किए जाने के बाद से लेकर पूरे 90 के दशक के अंत तक चला था। उस समय भले इंटरनेट नहीं था लेकिन इस रेप व ब्लैकमेल स्कैंडल की ख़बरें लोगों के बीच आग की तरह फैली थी। सामाजिक स्तर पर इस केस का एक बुरा असर ये पड़ा था कि अजमेर की लड़कियों की शादी कराने में काफी मशक्कतें करनी पड़ती थीं। लोग उनके चरित्र पर सवाल उठाते थे। पूरे शहर को एक ही नज़र से देखा जाने लगा था।
संतोष गुप्ता अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं कि शुरू से ही पुलिस का जोर दोषियों को सज़ा दिलाने पर कम और कथित रूप से पैदा होने वाली ‘क़ानून व्यवस्था के विपरीत स्थिति’ से निपटने की तैयारी में ज्यादा था।
यह घटना है 1991 राजस्थान में अजमेर का सोफिया गर्ल्स कॉलेज, देश में सबसे नामी स्कूलों में एक. सोफिया गर्ल्स कॉलेज में बड़े बड़े लोगों की लड़कियाँ पढने आती थी. राजस्थान के कई IAS और IPS की बेटियाँ भी यहीं पर पढ़ती थी.
शहर में रहने वाले एक लड़के फारुख चिश्ती ने स्कूल की एक 9वीं कक्षा की एक लड़की से दोस्ती कर ली. छुट्टी के बाद वो छात्रा फारुख चिश्ती के साथ जाने लगी. और एक दिन उसे फार्म हाउस पर ले जा कर उसके साथ सामूहिक बलात्कार करके, उसकी न्यूड तस्वीरें लीं और उन्हीं तस्वीरों से उसे ब्लैकमेल कर उस लड़की की सहेलियों को भी लाने को कहा गया।
जिसके बाद तो इस घटना को लेकर चेन बनती गई. अब इस गैंग द्वारा सामूहिक बलात्कार की गई हिंदू लड़की को एक नई लड़की लाने को ब्लैकमेल किया जाता।
जिस कारण पीड़ित लड़की अपनी सेहली, बहन, भाभी या दूसरी किसी रिश्तेदार को यहां पर ले आती और फिर उस नई शिकार के साथ भी यही प्रक्रिया दोहराया जाता।
इस रेप कांड का मास्टरमाइंड फारुख चिश्ती अकेला नही था. उसके साथ ख्वाज़ा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह से जुड़ा पूरा एक गिरोह सक्रिय था. उसका मुख्य सहयोगी था।
*अजमेर युवा कांग्रेस का अध्यक्ष फारुख चिश्ती,
*कॉन्ग्रेस की अजमेर यूनिट का उपाध्यक्ष नफीस चिश्ती,
*अजमेर कांग्रेस पार्टी का जॉइंट सेक्रेटरी अनवर चिश्ती।
बहुत संगठित ढंग से उनका गिरोह अपना काम करता रहा. मजहबी और कांग्रेसी संरक्षण मिला हुआ था तो वैसे भी डरने की कोई बात नही थी. अजमेर के ही एक फार्म हाउस पर यह काम बड़े आराम से चलता रहा. लड़कियों को लेने के लिए गाड़ी जाती थी और साथ में उन्हें घर तक गाड़ी से छोड़ा जाता था. बलात्कार के समय उनकी फ़ोटो खीच ली जाती थी ताकि वो किसी के आगे मुँह खोलने की हिम्मत ना कर सके.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस ब्लैकमेल के द्वारा लगभग 250 से ज्यादा लड़कियों के साथ बलात्कार हुआ। इसके बाद इन लोगों के द्वारा वहां के नेताओं और अधिकारियों को खुश करने के लिए इन लड़कियों को भेजा जाने लगा।
वहीं कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो यह आंकड़ा 250 से बहुत ज्यादा है।
आपको बता दें कि साल 1991 में आज की तरह डिजिटल और मोबाइल कैमरे नहीं होते थे। उस समय तो रील वाले कैमरे होते थे. जब इन कैमरों की रील धुलाई के लिए स्टूडियो में भेजी जाती थी तो रील धुलने वाले लोग एक्स्ट्रा कॉपी निकाल कर अलग से उन शिकार लड़कियों का शोषण करते थे. बताया तो ये भी जाता है कि स्कूल की इन लड़कियों के साथ रेप करने में नेता, सरकारी अधिकारी, कुछ पत्रकार, इन बलात्कारियों के ड्राइवर और नोकर भी शामिल थे. ये चेन लगातार बढ़ती गई है और देखते ही देखते ब्लैकमेलर्स की संख्या 18 तक पहुंच गई, जबकि रेप करने वाले गैंग में इसके कई गुना लोग शामिल थे जिसमें फोटो लैब के मालिक के साथ-साथ लैब टेक्नीशियन भी शामिल थे. इस गैंग के लोग खुद तो बलात्कार करते ही थे साथ ही ये अपने जानने वालों को भी इन लड़कियों को परोसते थे.
लेकिन अब इतने बड़े पैमाने पर ब्लैकमेल से तंग आकर वर्षा 1991 के आखरी महीने से उन लड़कियों ने एक एक करके आत्महत्या करनी शुरू कर दीं. एक ही कॉलेज की छात्राओं का इस तरह आत्महत्या करना ही मामले की पोल खुलने का कारण बना.
1 हीं कॉलेज की लगभग 6 छात्राओं का इतने कम समय में आत्महत्या करने के बावजूद प्रशासन अधिकारीयों ने कोई एक्शन नहीं लिया। लेकिन तभी वहां प्रकाशित होने वाली प्रमुख अखबार नवज्योति के रिपोर्टरों और एडिटर के पास कुछ लड़कियों का न्यूड फोटो पहुंचा। इसके बाद नवज्योति के रिपोर्टर संतोष गुप्ता और उसकी टीम ने अपने स्तर से छानबीन कर इस फोटो के पीछे की सच्चाई का पता लगाया।
और इसके बाद सरकार और प्रशासन के दवाब के बाबजूद नवज्योति अखबार ने मई 1992 को इन न्यूड फोटो को ब्लर करके इसके पीछे की सच्चाई को प्रमुखता से छापा।
नवज्योति में खबर छपते हीं पूरे अजमेर में हिंदू सड़को पर उतर आए। इसके बाद पुलिस प्रशासन को मजबूर होकर बलात्कारियों के खिलाफ रिपोर्ट लिखना पड़ा।
जब इस बलात्कार कांड का भंडाफोड़ हुआ उस वक्त केंद्र और राजस्थान दोनो जगह कांग्रेस का सरकार था। जिस कारण कांग्रेस का पूरा सिस्टम आरोपियों को बचाने में जुट गया. जो भी सामने आता उसे डरा धमका कर चुप करा दिया जाता. कहा गया आरोपियों पे कार्यवाही हुई तो साम्प्रदायिक मामला ख़राब हो जायेगा. बलात्कारी मुसलमान थे इसलिए मोमबत्ती गैंग भी लड़कियों के बजाय आरोपियों के समर्थन में खड़ा हो गया था.
सबका प्रयास यही था कि देश के लोगों को ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के आड़ में हुए इस घिनौनी और बर्बर कांड की कानों कान ख़बर ना लगे. उन्हें चिंता थी की दरगाह पर आने वाले हिन्दूओं की संख्या कम हो सकती है.
काफी समय बाद जब एक गैर सरकारी संगठन ने फोटो के जरिए लगभग तीस लड़कियों की पहचान कर ली तब जाकर उसने इस मामले को फिर से उठाने और करवाही करने की मांग की और, लेकिन सामाजिक बदनामी के डर से कोई भी आगे आने को तैयार नहीं हुआ. कुल 12 लड़कियां केस फाइल करने को तैयार हो गईं लेकिन धमकियों की वजह से इनमें से भी 10 लड़कियों ने अपने नाम वापस ले लिए. अब बचीं सिर्फ दो लड़कियों ने हिम्मत बरकरार रखते हुए इस मामले में आगे बढ़ीं और केस फाइल कर दिया.
इन दोनों बहादुर लड़कियों ने 16 बलात्कारियों की शिनाख्त की जिसमें से ग्यारह लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया, जिला कोर्ट ने इनमें से आठ लोगों को उम्र कैद की सजा सुनाई. इसी बीच मुख्य आरोपियों में से एक जो कॉन्ग्रेस के अजमेर यूनिट का अध्यक्ष था फारूक चिश्ती ने अपना मानसिक संतुलन ठीक नहीं होने का सर्टिफिकेट पेश कर दिया।
जिसके बाद 2007 में मानसिक विक्षिप्त घोषित आरोपित फारूक चिश्ती को अजमेर की एक फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने दोषी मान कर सज़ा सुनाई और राजस्थान हाईकोर्ट ने इस निर्णय को बरकरार भी रखा। लेकिन, हाईकोर्ट ने उसके द्वारा तब तक जेल में बिताई गई अवधि को ही सज़ा मान लिया।
आपको बता दें कि कुल मिलाकर अजमेर के इस जघन्य बलात्कार कांड में से अभी तक कोई भी मुख्य आरोपी अभी तक जेल में नहीं है बाकी आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एक बलात्कार की सजा अगर 10 साल हुई है तो सैकड़ों बलात्कार की कितनी सजा होनी चाहिए.
30 साल से केस चल रहा है। कई पीड़िताएँ अपने बयानों से भी मुकर गईं। कइयों की शादी हुई, बच्चे हुए, बच्चों के भी बच्चे हुए। 30 साल में आखिर क्या कुछ नहीं बदल जाता?
हमारी समाजिक संरचना को देखते हुए शायद ही ऐसा कहीं होता है कि कोई महिला अपने बेटे और गोद में पोते को रख कर 30 साल पहले ख़ुद पर हुए यूँ जुर्म की लड़ाई लड़ने के लिए अदालतों का चक्कर लगाए। शायद उन महिलाओं ने भी इस जुल्म को भूत मान कर नियति के आगोश में जाकर अपनी ज़िंदगी को जीना सीख लिया है और उनमें से अधिकतर अपने हँसते-खेलते परिवारों के बीच 30 साल पुरानी दास्तान को याद भी नहीं करना चाहतीं।
और सबसे खास बात तो ये रहा की इन 250 से जायदा लड़कियों से बलात्कार के आरोपियों को इस देश के कोर्ट ने कुछ हीं समय के बाद बेल भी देना प्रारंभ कर दिया। जिस कारण कोर्ट का सम्मान करने के उद्देश्य से इन आरोपियों में से 3 ने आत्महत्या कर लिया और अधिकांस देश छोड़ कर फरार हो गया।
इस केस पर बाद में टीवी मीडिया पर शो से लेकर किताबें तक लिखी गईं लेकिन एक चीज जो आज तक कहीं नहीं दिखा, वो है- न्याय। अगर उस समय पुलिस ने इस केस में आरोपितों पर शिकंजा कसा होता तो शायद उन्हें फाँसी की सज़ा भी मिल सकती थी।
अक्टूबर 1992 में एक पत्रकार मदन सिंह की हत्या कर दी गई थी, जो अजमेर में ‘लहरों की बरखा’ नामक दैनिक पत्रिका का संचालन करते थे। हॉस्पिटल में घुस कर उन्हें मार डाला गया था। इस हत्याकांड के लिंक इसी सेक्स स्कैंडल से जुड़े थे। इससे पहले भी उन पर गोलीबारी हुई थी, जिसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक डॉक्टर राजकुमार जयपाल को आरोपित बनाया था। इसके अलावा नेता के दोस्त सवाई सिंह को भी आरोपित बनाया गया था, जो अजमेर का लोकल माफिया था।
इन सबके बावजूद पुलिस ने उनके बयान को नज़रअंदाज़ किया और पत्रकार मदन सिंह की हत्या कर दी गई। एक अन्य आरोपित नरेंद्र सिंह की गिरफ़्तारी के बाद ही पुलिस ने कॉन्ग्रेस नेता को गिरफ्तार किया। इसके पीछे पुलिस को एक बड़े राजनीतिक-आपराधिक गठजोड़ की बू आई थी।
इस स्कैंडल को सामने लाने वाले ‘नवज्योति’ के संपादक रहे दीनबंधु चौधरी ने कहा कि वो इसी उलझन में थे कि लड़कियों के खिलाफ हुए अत्याचार को तस्वीरों के जरिए बयाँ किया जाए या नहीं। फिर उन्होंने आगे बढ़ने का निश्चय किया और इन तस्वीरों के सामने आने के बाद ही प्रशासन की तंद्रा टूटी और वो भी तब, जब लोग सड़कों पर उतर आए।
उस वक़्त अजमेर में 350 से भी अधिक पत्र-पत्रिका थी और इस सेक्स स्कैंडल के पीड़ितों का साथ देने के बजाए स्थानीय स्तर के कई मीडियाकर्मी उल्टा उनके परिवारों को ब्लैकमेल किया करते थे। आरोपितों को छोड़िए, इस पूरे मामले में समाज का कोई भी ऐसा प्रोफेशन शायद ही रहा हो, जिसने एकमत से इन पीड़िताओं के लिए आवाज़ उठाई हो।
वर्ष 1991 से यह मामला किन किन दौर से गुजरा!
1. 1992 में पूरे स्कैंडल का भांडा फूटा था तब पीड़ित युवतियों के बयान व अन्य सबूतों के आधार पर करीब दस आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।
2. 1994 में आरोपियों में से एक पुरुषोत्तम ने जमानत पर छूटने के बाद सुसाइड कर लिया।
3. केस का पहला फैसला मुकदमा दर्ज होने के छह साल बाद 1998 में आया। तत्कालीन जिला जज कन्हैयालाल व्यास ने आठ आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई
4. इस फैसले से कुछ समय पहले इस केस के मुख्य आरोपी फारूख चिश्ती ने मानसिक रोग होने का दावा पेश किया जिस वजह से उसके खिलाफ मुकदमा टल गया और बाद में उसकी अलग से सुनवाई हुई।
5. जिला न्यायाधीश के फैसले के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील पेश की जहां जज ने उम्रकैद की सजा को कम कर सिर्फ दस साल की कर दी।
6. सजा कम होने बाद मुल्जिमों सहित राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग अपील दायर की जिसका निस्तारण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दस साल की सजा बरकरार रखी।
7. 2003 में दिल्ली के धौलाकुआं में नफीस चिश्ती को बुरके में गिरफ्तार किया गया और उसके खिलाफ मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई। सुनवाई पूरी होने से पहले ही 2010 में नसीम और इकबाल भाटी पकड़े गए और फिर 2012 में सलीम चिश्ती भी पुलिस के हत्थे चढ़ा। इस तरह पांच आरोपियों के खिलाफ नए सिरे से मुकदमा शुरू हुआ जो अब भी लंबित है।
8. करीब 4 साल पहले सलीम चिश्ती ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए अर्जी लगाई थी, हाईकोर्ट ने अर्जी तो खारिज कर दी लेकिन विचारण अदालत को निर्देश दिए हैं कि इस केस की जल्द सुनवाई कर निस्तारण करें।
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